(Crude Oil) कच्चा तेल सिर्फ एक commodity नहीं है, बल्कि दुनिया की राजनीति, युद्ध, कूटनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार है। इसके ज़रिये काफी देश एक दूसरे के साथ जुड़कर तेल का व्यापर करते है साथ में और भी काफी ज़रूरती चीज़ो के लेन-देन किया जाता है। आज सवाल यह नहीं है कि तेल महंगा होगा या सस्ता, बल्कि सवाल है कौन देश फायदा उठाएगा और कौन दबाव में आएगा?
22 अक्टूबर को रोसनेफ्ट और लुकोइल पर लगे प्रतिबन्ध भी रूस को बातचीत करने के लिए मजबूर नहीं कर पाए है। भारत और चीन ने एक तरफ़ा अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध किया है और साफ़-साफ़ कहा है की रूसी तेल की खरीदी को पूरी तरह से रोकना बिलकुल भी मुम्किन नहीं है क्योकि 2022 के बाद से रियायती दर पर तेल मिलने से भारत को लगभग 12-17 अरब डॉलर का फायदा हुआ है।
आज सवाल यह नहीं है कि तेल महंगा होगा या सस्ता बल्कि सवाल है कि कौनसा देश इसका फायदा उठाएगा और कौनसा देश दबाव में आएगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंध, मध्य-पूर्व की अस्थिरता और चीन-भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों ने यह साफ कर दिया है कि 2026–27 में तेल बाजार पूरी तरह बदल सकता है। अमेरिका और उसके साथी देशों ने रूस की तेल कंपनियों, शिपिंग नेटवर्क और पेमेंट सिस्टम पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसका मकसद रूस की तेल आय को सीमित करना है। लेकिन असलियत यह है कि रूस का तेल बाजार से पूरी तरह गायब नहीं हुआ है और ना ही पूरी तरह से गायब हो सकता है। वह अब एशिया-केंद्रित रणनीति अपना चुका है साथ ही भारत और चीन उसके सबसे बड़े खरीदार बन चुके हैं।
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(Crude Oil) इसका सीधा असर यह हुआ कि तेल का फ्लो बदला है लेकिन खत्म नहीं हुआ है 2026–27 में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के चान्सेस काफी ज़्यादा है।भारत रूस से कुछ छूट पर कच्चा तेल खरीदता है जो की अंतर्राष्ट्रीय बाजार की ब्रेंट क्रूड कीमत से आमतौर पर $10-$15 प्रति बैरल सस्ता होता है जो की लगभग $50-$53 बनता है जब ब्रेंट करीब $63 पर हो जिससे की रिफाइनरियो को फायदा होता है हलाकि अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण हाल ही में खरीद में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। यह सस्ता तेल भारत के लिए बहुत ज़रूरी है क्योकि यह देश के कुल तेल आयत का एक बहुत बड़ा हिस्सा है और छूट मिलने के कारण लागत भी कम रहती है और चीन के बाद रूस से तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश भारत है लेकिन अमेरिका के दबाव और प्रतिबंधो की वजह से आयत मात्रा में उतार-चढ़ाव आता रहता हैं।
अगर रूस से तेल की सप्लाई एशिया में बनी रहती है और अमेरिका नए बड़े प्रतिबंध नहीं लगाता और वैश्विक मांग कंट्रोल में रहती है तो 2026–27 में तेल की कीमतों में बदलाव नहीं आएगा और भारत को सस्ता या डिस्काउंट वाला तेल आगे भी मिलता रहेगा जिससे की पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव नहीं आएगा और यह भारत के लिए सबसे फायदेमंद स्थिति होगी। लेकिन अगर रूस पर प्रतिबंध और भी ज़्यादा सख्त हुए , मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा और वैश्विक मांग में तेजी आई तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा जिससे कि सरकार पर सब्सिडी या टैक्स कटौती का दबाव आएगा साथ ही महंगाई बढ़ने का खतरा भी रहेगा। यह स्थिति कंट्रोल की जा सकती है लेकिन आसान नहीं होगी इससे सरकार और देश की जनता को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
लेकिन अगर रूस की सप्लाई गंभीर रूप से रोक दिया गया ,अमेरिका-ईरान या मध्य-पूर्व में युद्ध जैसे हालात बनते है और OPEC ने उत्पादन सीमित रखा तो भारत के अंदर पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे और देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा झटका लग सकता है साथ ही ट्रांसपोर्ट, FMCG और इंडस्ट्री पर भी सीधा असर पड़ेगा जिससे की देश में 2008 जैसी स्तिथि फिर से देखने को मिल सकती है।
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(Crude Oil) अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल कम खरीदे और अमेरिकी या पश्चिमी देशों से महंगा तेल ले लेकिन भारत का रुख साफ है कि ऊर्जा सुरक्षा पहले होनी चाहिये यही कारण है कि भारत खुले तौर पर किसी का विरोध नहीं करता लेकिन अपने फायदे से भी पीछे नहीं हटता यह भारत की स्मार्ट एनर्जी स्ट्रैटेजी है भारत आने वाले वर्षों में तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी काम कर रहा है। जैसे की:
- सोलर और विंड एनर्जी में बड़े निवेश और 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल टारगेट है।
- इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को बढ़ावा देना और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन है।
- रूस के साथ-साथ सऊदी अरब, UAE, इराक और अफ्रीकी देशों से भी खरीद तेल खरीदना।
(Crude Oil) इसका मतलब साफ है कि भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता है और यह मानना पड़ेगा कि तेल की जंग में भारत सिर्फ दर्शक नहीं, स्मार्ट खिलाड़ी है।
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